Sunday, 18 May, 2008

मुसाफ़िर हूँ यारों विशेष : सिक्किम (गंगटोक, लाचेन, लाचुंग, यूमथांग और गुरुडांगमार) का मेरा संकलित यात्रा वृत्तांत

मुसाफ़िर हूँ यारों पर आपसे मैंने वादा किया था कि अपने अनेक भागों में बँटे हुए यात्रा विवरणों को संकलित रूप में यहाँ पेश करूँगा। इस कड़ी में पेश है उत्तरी सिक्किम और गंगटोक का मेरा यात्रा वृत्तांत जो दो साल पहले मैंने दस भागों में अपने चिट्ठे पर लिखा था। इसका संपादित अंश अंतरजाल की हिंदी पत्रिका अभिव्यक्ति पर भी छपा था। मेरे पुराने साथी इसे पढ़ चुके हैं पर आशा है आप में से बहुतों ने इसे ना पढ़ा हो। जितना आनंद मुझे इस यात्रा को कर के आया था उसका दस प्रतिशत भी अगर इस आलेख से आप तक पहुँच पाया तो मैं अपने प्रयास को सफ़ल समझूँगा।
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गर्मियाँ अपने पूरे शबाब पर हैं । आखिर क्यूँ ना हों, मई का महिना जो ठहरा । अगर ऐसे में भी सूर्य देव अपना रौद्र रूप हम सबको ना दिखा पायें तो फिर लोग उन्हें देवताओं की श्रेणी से ही हटा दें :)। अब आपके शहर की गर्मी तो मैं कम कर नहीं सकता, कम से कम इस चिट्ठे पर ही ले चलता हूँ एक ऐसी जगह जहाँ पिछले महिने तमाम ऊनी कपड़े भी हमारी ठंड से कपकपीं कम करने में पूर्णतः असमर्थ थे।

बात ७ अप्रैल की है जब हमारा कुनबा रांची से रवाना हुआ । अगली दोपहर हम न्यू जलपाईगुड़ी पहुँचे । हमारा पहला पड़ाव गंगतोक था जो कि सड़क मार्ग से सिलीगुड़ी से ४ घंटे की दूरी पर है । सिलीगुड़ी से ३० किलोमीटर दूर चलते ही सड़क के दोनों ओर का परिदृश्य बदलने लगता है पहले आती है हरे भरे वृक्षों की कतारें जिनके खत्म होते ही ऊपर की चढ़ाई शुरू हो जाती है।

हाँ, एक बात तो बतानी रह ही गई कि सिलीगुड़ी (Siligudi) से निकलते ही हमारे इस समूह को इक नयी सदस्या मिलने वाली थीं। वो यहाँ से जो साथ हुईं....क्या बताऊँ पूरा सफर उसकी मोहक इठलाती तो कभी बलखाती अदाओं को निहारने में ही बीता। खैर,कुछ भी हो उसकी वजह से पूरी यात्रा खुशनुमा रही ।


क्या कहा आपने नाम क्या था उनका? अजी छोड़िए नाम में क्या रखा है पर फिर भी आप सब की यही इच्छा है तो बताये देते हैँ....नाम था उनका तीस्ता (Teesta) । कहीं आप कुछ और तो उम्मीद नहीं लगाये बैठे थे :)?


खैर तीस्ता की हरी भरी घाटी और घुमावदार रास्तों में चलते चलते शाम हो गई और नदी के किनारे थोड़ी देर के लिये हम टहलने निकले। नीचे नदी की हल्की धारा थी तो दूर पहाड़ पर छोटे छोटे घरों की बगल से निकलती उजले धुँऐ की लकीर।


गंगतोक* (वैसे तो वहाँ जाने के पहले मैं गंगटोक बोलता था पर वहाँ हिंदी में हर जगह गंगतोक ही लिखा मिला) से अभी भी हम ६० किलोमीटर की दूरी पर थे।) करीब ७.३० बजे हमें ऊँचाई पर बसे शहर की जगमगाहट दूर से ही दिखने लगी । पर गंगतोक में तो हमारी इस यात्रा का संक्षिप्त ठहराव था । हमें अभी बहुत दूर और बहुत ऊपर जाना था ......

गंगतोक (Gangtok) पहुँचते ही हमने होटल में अपना सामान रखा । दिन भर की घुमावदार यात्रा ने पेट में हलचल मचा रखी थी । सो अपनी क्षुधा शान्त करने के लिये करीब ९ बजे मुख्य बाजार की ओर निकले । पर ये क्या एम. जी. रोड (M.G.Road) पर तो पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था। दुकानें तो सारी बंद थीं ही कोई रेस्तरॉ भी खुला नहीं दिख रहा था ! पेट में उछल रहे चूहों ने इत्ती जल्दी सो जाने वाले इस शहर को मन ही मन लानत भेजी ।मुझे मसूरी की याद आई जहाँ रात १० बजे के बाद भी बाजार में अच्छी खासी रौनक हुआ करती थी । खैर भगवन ने उन चूहों की सुन ली और अंततः घूमते घामते हमें एक बंगाली भोजनालय खुला मिला । वैसे भोजन यहाँ अन्य पर्वतीय स्थलों की तुलना में सस्ता था।

सुबह हुई और साथ वालों ने खबर दी की बाहर हो आओ अच्छा नज़ारा है। फिर क्या था निकल पड़े कैमरे को ले कर। होटल के ठीक बाहर जैसे ही सड़क पर कदम रखा सामने का दृश्य ऐसा था मानो कंचनजंघा (Kanchanjungha) की चोटियाँ बाहें खोल हमारा स्वागत कर रही हों । आप भी देखें !

सुबह का गंगतोक शाम से भी प्यारा था । पहाड़ों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ मौसम बदलते देर नहीं लगती । सुबह की कंचनजंघा १० बजे तक तक बादलों में विलुप्त हो चुकी थी । कुछ ही देर बाद हम गंगतोक के ताशी विउ प्वाइंट(५५०० फीट MSL) पर थे । यहाँ से दो मुख्य रास्ते कटते हैं । एक पूरब की तरफ जो नाथू ला जाता है और दूसरा उत्तरी सिक्किम जिधर हमें जाना था ।

ताशी विउ प्वाइंट (Tashi View Point) से हमने उत्तरी सिक्किम राजमार्ग (North Sikkim Highway) की राह पकड़ी और थोड़ी ही देर में समझ लिया कि पहाड़ पर आने के पहले भगवान को अच्छी मनःस्थिति यानि गुड ह्यूमर में रखना इतना जरूरी क्यूँ है ? बाप रे ! एक ओर खाई तो दूसरी ओर भू-स्खलन से जगह जगह कटी फटी सड़कें ! अन्नदाता के ऊपर से बस एक चट्टान खिसकाने की देरी है कि सारी यात्रा का बेड़ा गर्क ! और अगर इन्द्र का कोप हो तो ऐसी बारिश करा दें कि चट्टान आगे खिसक भी रही हो तो भी गाड़ी की विंडस्क्रीन पर कुछ ना दिखाई दे ! खैर हम लोग कबी (Kabi) और फेनसांग (Phensang) तक सड़क के हालात देख मन ही मन राम-राम जपते गए !

फेनसांग के पास एक जलप्रपात मिला ! हमारा समूह तसवीरें खिंचवाने में उत्सुक नहीं दिखा तो हमने अपना कैमरा घुमाया । सामने बैठी एक विदेशी बाला गिरते पानी के प्रवाह से ऐसी मंत्रमुग्ध थी मानों जन्नत में विचरण कर रही हो । ये देख के स्वतः क्लिक का बटन दब गया और नतीजा आप सब के सामने है । :)

फेनसांग से मंगन (Mangan) तक का मार्ग सुगम था ! इन रास्तों की विशेषता ये है कि एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ जाने के लिये पहले आपको एकदम नीचे उतरना पड़ेगा और फिर चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी ! मंगन पहुँचते-पहुँचते ये प्रक्रिया हमने कई बार दोहरायी । ऐसे में तीस्ता कभी बिलकुल करीब आ जाती तो कभी पहाड़ के शिखर से एक खूबसूरत लकीर की तरह बहती दिखती।

मंगन बाजार (Mangan Bazaar) में अपने एक पुराने सहकर्मी की तालाश में हम रुके । पता चला कि वो सड़क से थोड़े नीचे ही रहते हैं । खैर, मुलाकात भी हो गई पर पहाड़ के इस थोड़े नीचे का मर्म वापस चढ़ते समय ही पता लग सका जब अंतिम चार सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते हालत खराब हो गयी।

शाम के ४.३० बजे तक हम चुन्गथांग (Chungthang) में थे । लाचेन और लाचुन्ग की तरफ से आती जल संधियाँ यहीं मिलकर तीस्ता को जन्म देती हैं। थोड़ा विश्राम करने के लिये हम सब गाड़ी से नीचे उतरे।


चुन्गथांग की हसीन वादियों और चाय की चुस्कियों के साथ सफर की थकान जाती रही। शाम ढ़लने लगी थी और मौसम का मिज़ाज भी कुछ बदलता सा दिख रहा था।
यहाँ से हम शीघ्र ही लाचेन के लिये निकल पड़े जो कि हमारा अगला रात्रि पड़ाव था। लाचेन तक के रास्ते में रिहाइशी इलाके कम ही दिखे । रास्ता सुनसान था, बीच-बीच में एक आध गाड़ियों की आवाजाही हमें ये विश्वास दिला जाती थी कि सही मार्ग पर ही जा रहे हैं । लाचेन के करीब १० किमी पहले मौसम बदल चुका था । लाचेन घाटी (Lachen Valley) पूरी तरह गाढ़ी सफेद धुंध की गिरफ्त में थी और वाहन की खिड़की से आती हल्की फुहारें मन को शीतल कर रहीं थीं।


६ बजने से कुछ समय पहले हम लगभग ९००० फीट ऊँचाई पर स्थित इस गांव में प्रवेश कर चुके थे !

पर हम तो मन ही मन रोमांचित हो रहे थे उस अगली सुबह के इंतजार में जो शायद हमें उस नीले आकाश के और पास ले जा सके !


लाचेन (Lachen) की वो रात हमने एक छोटे से लॉज में गुजारी । रात्रि भोज के समय हमारे ट्रैवल एजेन्ट ने सूचना दी (या यूँ कहें कि बम फोड़ा )कि सुबह ५.३० बजे तक हमें निकल जाना है । अब उसे किस मुँह से बताते कि यहाँ तो ९ बजे कार्यालय पहुँचने में भी हमें कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। सो १० बजते ही सब रजाई में घुस लिये। अब इस नयी जगह और कंपकंपाने वाली ठंड में जैसे तैसे थोड़ी नींद पूरी की और सुबह ६ बजे तक हम सब इस सफर की कठिनतम यात्रा पर निकल पड़े।

मौसम से मुकाबले के लिये हम कपड़ों की कई परतें यानि इनर, टी शर्ट, स्वेटर, मफलर और जैकेट चढ़ाकर पूरी तरह तैयार थे। वैसे भी ४-५ घंटों में हम १७००० फीट की ऊँचाई छूने वाले थे।

लाचेन से आगे का रास्ता फिर थोड़ा पथरीला था। सड़क कटी-कटी सी थी। कहीं-कहीं पहाड़ के ऊपरी हिस्से में भू-स्खलन होने की वजह से उसके ठीक नीचे के जंगल बिलकुल साफ हो गये थे। आगे की आबादी ना के बराबर थी। बीच-बीच में याकों का समूह जरूर दृष्टिगोचर हो जाता था। चढ़ाई के साथ साथ पहाड़ों पर आक्सीजन कम होती जाती है । इसलिये हमें १७००० फीट पहुँचने के पहले रुकना था, १४००० फीट की ऊँचाई पर बसे थान्गू में ताकि हम कम आक्सीजन वाले वातावरण में अभ्यस्त हो सकें ।


करीब ९ बजे हम थान्गू (Thangu) में थे । बचपन में भूगोल का पढ़ा हुआ पाठ याद आ रहा था कि जैसे जैसे ऊपर की ओर बढ़ेंगे वैसे वैसे वनस्पति का स्वरूप बदलेगा। इसी तथ्य की गवाही हमारे अगल बगल का
परिदृश्य भी दे रहा था । चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की जगह अब नुकीली पत्ती वाले पेड़ो ने ले ली थी । पर ये क्या थान्गू पहुँचते पहुँचते तो ये भी गायब होने लगे थे। रह गये थे, तो बस छोटे-छोटे झाड़ीनुमा पौधे।



थान्गू तक धूप नदारद थी । बादल के पुलिंदे अपनी मन मर्जी इधर उधर तैर रहे थे । पर पहाड़ों के सफर में धूप के साथ नीला आकाश भी साथ हो तो क्या कहने ! पहले तो कुछ देर धूप छाँव का खेल चलता रहा । पर आखिरकार हमारी ये ख्वाहिश नीली छतरी वाले ने जल्द ही पूरी की और उसके बाद जो दृश्य हमारे सामने था वो आप इन तसवीरों में खुद देख सकते हैं।

नीला आसमान, नंगे पहाड़ और बर्फ आच्छादित चोटियाँ मिलकर ऐसा मंजर प्रस्तुत कर रहे थे जैसे हम किसी दूसरी ही दुनिया में हों ।




१५००० फीट की ऊँचाई पर हमें विक्टोरिया पठारी बटालियन (Victoria Plateau Battalion) का चेक पोस्ट मिला । दूर-दूर तक ना कोई परिंदा दिखाई पड़ता था और ना कोई वनस्पति ! सच पूछिये तो इस बर्फीले पठारी रेगिस्तान में कुछ हो हवा जाये तो सेना ही एकमात्र सहारा थी ।थोड़ी दूर और बढ़े तो अचानक ये बर्फीला पहाड़ हमारे सामने आ गया !

गुनगुनी धूप, गहरा नीला गगन और ऊपर से इतनी पास इस पहाड़ को देख के गाड़ी से बाहर निकलने की इच्छा सबके मन में कुलबुलाने लगी । पर उस इच्छा को फलीभूत करने पर हमारी जो हालत हुई उसकी एक अलग कहानी है । वैसे भी हम गुरूडांगमार के बेहद करीब थे ! अरे चौंकिये मत यही तो था इस यात्रा का पहला लक्ष्य ! दरअसल गुरूडांगमार (Gurudongmar) एक झील का नाम है जो समुद्र तल से करीब १७३०० फीट पर है ।


जिंदगी में कितनी ही बार ऐसा होता है कि जो सामने स्पष्ट दिखता है उसका असली रंग पास जा के पता चलता है। अब इतनी बढ़िया धूप, स्वच्छ नीले आकाश को देख किसका मन बाहर विचरण करने को नहीं करता ! सो निकल पड़े हम सब गाड़ी के बाहर.....पर ये क्या बाहर प्रकृति का एक सेनापति तांडव मचा रहा था, सबके कदम बाहर पड़ते ही लड़खड़ा गये, बच्चे रोने लगे, कैमरे को गले में लटकाकर मैं दस्ताने और मफलर लाने दौड़ा

जी हाँ, ये कहर वो मदमस्त हवा बरसा रही थी जिसकी तीव्रता को १६००० फीट की ठंड, पैनी धार प्रदान कर रही थी । हवा का ये घमंड जायज भी था। दूर दूर तक उस पठारी समतल मैदान पर उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था, फिर वो अपने इस खुले साम्राज्य में भला क्यूँ ना इतराये । खैर जल्दी-जल्दी हम सब ने कुछ तसवीरें खिंचवायीं । अब इन तसवीरों की कृत्रिम मुस्कुराहट पर कतई ना जाइयेगा, वो सिर्फ हम ही जान सकते हैं कि उस वक्त क्या बीत रही थी। इसके बाद नीचे उतरने की जुर्रत किसी ने नहीं की और हम गुरूडांगमार पहुँच कर ही अपनी सीट से खिसके । धार्मिक रूप से ये झील बौद्ध और सिख अनुयायियों के लिए बेहद मायने रखती है । कहते हैं कि गुरूनानक के चरण कमल इस झील पर पड़े थे जब वो तिब्बत की यात्रा पर थे । ये भी कहा जाता है कि उनके जल स्पर्श की वजह से झील का वो हिस्सा जाड़े में भी नहीं जमता ।

गनीमत थी कि १७३०० फीट की ऊँचाई पर हवा तेज नहीं थी । झील तक पहुँच तो गये थे पर इतनी चढ़ाई बहुतों के सर में दर्द पैदा करने के लिये काफी थी। मन ही मन इस बात का उत्साह भी था कि आखिर सकुशल इस ऊँचाई पर पहुँच ही गये। झील का दृश्य बेहद मनमोहक था। दूर-दूर तक फैला नीला जल और पार्श्व में बर्फ से लदी हुई श्वेत चोटियाँ गाहे-बगाहे आते जाते बादलों के झुंड से गुफ्तगू करती दिखाई पड़ रहीं थीं। दूर कोने में झील का एक हिस्सा जमा दिख रहा था। हम लोगों को वो नजदीक से देखने की इच्छा हुई, तो चल पड़े नीचे की ओर।


बर्फ की परत वहाँ ज्यादा मोटी नहीं थी। हमने देखा कि एक ओर की बर्फ तो पिघल कर टूटती जा रही है! पर हमारे मित्र को उस पर खड़े हो कर तसवीर खिंचवानी थी । हमने कहा भइया आप ही जाइये तसवीर हम खींच देते हैं। झील के दूसरी ओर सुनहरे पत्थरों के पीछे गहरे नीले आकाश एक और खूबसूरत परिदृश्य उपस्थित कर रहा था ।


खैर वापसी की यात्रा लंबी थी इसलिये झील के किनारे दो घंटे बिताने के बाद हम वापस चल पड़े । अब नीचे उतरे थे तो ऊपर भी चढ़ना था पर इस बार ऊपर की ओर रखा हर कदम ज्यादा ही भारी महसूस हो रहा था । सीढ़ी चढ़ तो गये पर तुरंत फिर गाड़ी तक जाने की हिम्मत नहीं हुई । कुछ देर विश्राम के बाद सुस्त कदमों से गाड़ी तक पहुँचे तो अचानक याद आया कि एक दवा खानी तो भूल ही गये हैं । पानी के घूँट के साथ हाथ और पैर और फिर शरीर की ताकत जाती सी लगी । कुछ ही पलों में मैं सीट पर औंधे मुँह लेटा था । शरीर में आक्सीजन की कमी कब हो जाए इसका जरा भी पूर्वाभास नहीं होता । खैर मेरी ये अवस्था सिर्फ २ मिनटों तक रही और फिर सब सामान्य हो गया । वापसी में हमें चोपटा घाटी (Chopta Valley) होते हुये लाचुंग तक जाना था । इस यात्रा की सबसे बेहतरीन तसवीरें मेरी समझ से मैंने लाचुंग की उस निराली सुबह की थीं ।




गुरुडांगमार (Gurudongmaar) से वापस अब हमें लाचुंग की ओर लौटना था । सुबह से ७० कि.मी.की यात्रा कर ही चुके थे । अब १२० कि.मी की दुर्गम यात्रा के बारे में सोचकर ही मन में थकावट हो रही थी। इस पूरी सिक्किम यात्रा में दोपहर के बाद शायद ही कही धूप के दर्शन हुये थे।

हवा ने फिर जोर पकड़ लिया था। सामने दिख रहे एक पर्वत पर बारिश के बादलों ने अपना डेरा जमा लिया था ।

वापसी में हम थान्गू के पास चोपटा घाटी में थोड़ी देर के लिये रुके । दो विशाल पर्वतों के बीच की इस घाटी में इक पतली नदी बहती है जो जाड़ों के दिनों में पूरी जम जाती है ।


लाचेन पहुँचते पहुँचते बारिश शुरू हो चुकी थी । हमारे ट्रैवल एजेन्ट का इरादा लाचेन में भोजन करा के तुरंत लाचुंग ले जाने का था । पर बिना हाथ पैर सीधा किये कोई आगे जाने को तत्पर ना था । नतीजन ३ बजे के बजाए ४.३० में हम लाचेन से निकले । जैसे जैसे रोशनी कम हो रही थी वर्षा उतना ही प्रचंड रूप धारण करती जा रही थी । गजब का नजारा था...थोड़ी‍-थोड़ी दूर पर उफनते जलप्रपात, गाड़ी की विंड स्क्रीन से टकराती बारिश की मोटी मोटी बूँदे, सड़क की काली लकीर की अगल बगल चहलकदमी करते बादल और मन मोहती हरियाली... सफर के कुछ अदभुत दृश्यों में से ये भी एक था। चलती गाड़ी से ली हुयी ये तसवीर में बादलों की इस चाल की झलक देखें।

चुन्गथांग करीब ६ बजे तक पहुँच चुके थे। यही से लाचुंग के लिये रास्ता कटता है। चुंगथांग से लाचुंग का सफर डरे सहमे बीता। पूरा रास्ता चढ़ाई ही चढ़ाई थी। एक ओर बढ़ता हुआ अँधेरा तो दूसरी ओर बारिश की वजह से पैदा हुई सफेद धुंध ! इन परिस्थितियों में भी हमारा कुशल चालक ६०‍-७० कि.मी प्रति घंटे की रफ्तार से अपनी महिंद्रा हांक रहा था । अब वो कितना भी चुस्त कयूँ ना हो रास्ते का हर एक यू ‍टर्न हमारे हृदय की धुकधुकी बढ़ाता जा रहा था । निगाहें मील के हर एक बीतते पत्थर पर अटकी पड़ीं थी....आतुरता से इस बात की प्रतीक्षा करते हुये कि कब लाचुंग के नाम के साथ शून्य की संख्या दिखाई दे जाये ।

७.३० बजे लाचुन्ग (Lachung) पहुँच कर हमने चैन की साँस ली । बाहर होती मूसलाधार बारिश अगले दिन के हमारे कार्यक्रम पर कुठाराघात करती प्रतीत हो रही थी । थकान इतनी ज्यादा थी कि चुपचाप रजाई के अंदर दुबक लिये। प्रातः ५.३० बजे होटल की छत पर सैलानियों की आवाजाही देख कर हमें भी छत पर जाने की उत्सुकता हुई कि माजरा क्या है? देखा दूर- दूर तक बारिश का नामोनिशान तक नहीं है।

पहाड़ के बीचों बीच पतले झरने की सफेद लकीर, चट्टानों के इस विशाल जाल के सामने बौनी प्रतीत हो रही थी। पर असली नजारा तो दूसरी ओर था। पर्वतों और सूरज के बीच की ऐसी आँखमिचौनी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
पहाड़ के ठीक सामने का हिस्सा जिधर हमारा होटल था अभी भी अंधकार में डूबा था। दूर दूसरे शिखर के पास एक छोटा सा पेड़ किरणों की प्रतीक्षा में अपनी बाहें फैलाये खड़ा था। उधर बादलों की चादर को खिसकाकर सूर्य किरणें अपना मार्ग प्रशस्त कर रहीं थीं।

थोड़ी ही देर में ये किरणें कंचनजंघा की बर्फ से लदी चोटियों को यूँ प्रकाशमान करने लगीं मानो भगवन ने पहाड़ के उस छोर पर बड़ी सी सर्चलाइट जला रखी हो। शायद वर्षों तक ये दृश्य मेरे स्मृतिपटल पर अंकित रहे। अपने सफर के इस यादगार लमहे को मैं अपने कैमरे में कैद कर सका ये मेरी खुशकिस्मती है ।
हमारा अगला पड़ाव यूमथांग घाटी (Yumthang Valley) था । ये घाटी लॉचुंग से करीब २५ कि.मी. दूर है और यहाँ के लोग इसे फूलों की घाटी के नाम से भी बुलाते हैं । दरअसल ये घाटी रोडोडेन्ड्रोन्स की २४ अलग अलग प्रजातियों के लिये मशहूर है। सुबह की धूप का आनंद लेते हुये हम यूमथांग की ओर चल पड़े।

सारा रास्ता बैंगनी रंग के इन छोटे छोटे फूलों से अटा पड़ा था। करीब डेढ़ घंटे के सफर के बाद हम यूमथांग में थे।यूमथांग की सुन्दरता के जितने चर्चे हमने सुन रखे थे उस हिसाब से हमें निराश होना पड़ा ।



यूमथांग (Yumthang) के पास पहुँचते पहुँचते हमें रोडोडेन्ड्रोन्स (Rhodendrons) के जंगल दिखने शुरू हो गये थे। मार्च-अप्रैल से इनके पौधों में कलियाँ लगने लगती हैं। पर पूरी तरह से ये खिलते हैं मई महिने में , जब पूरी घाटी इनके लाल और गुलाबी रंगों से रंग जाती है। खैर हमें ये दृश्य नसीब नहीं हुआ क्योंकि हम वहाँ अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही टपक गए थे। चूंकि ये घाटी १२००० फीट की ऊँचाई पर स्थित है यहाँ गुरूडांगमार की तरह हरियाली की कोई कमी नहीं थी। कमी थी तो बस आसमान की उस नीली छत की जो सुबह में दिखने के बाद यहाँ पहुँचते ही गायब हो गई थी।


घाटी के बीच पत्थरों पे उछलती कूदती नदी बह रही है। जाड़े में ये पत्थर बर्फ के अंदर दब जाते हैं। इन गोल मटोल पत्थरों के ढ़ेर के साथ साथ हम सब काफी देर तक चलते रहे। किसी ने कहा रात में बारिश हुई है तो साथ में बर्फ भी गिरी होगी। फिर क्या था नदी का पाट छोड़ हम किनारे पर दिख रहे वृक्षों की झुरमुटों की ओर चल पड़े।


पेड़ों के बीच हमें बर्फ गिरी दिख ही गयी और ये जनाब तो इस तरह उस के पीछे लपके जैसे सारी एकसाथ ही खा लेंगे। अब इन्हें क्या पता था कि अगले दिन ही सृष्टिकर्ता इतनी बर्फ दिखाने वाले हैं जितनी हमने जिंदगी में ना देखी होगी।



पास में ही एक सल्फर युक्त पानी का स्रोत था पर वहाँ तक पहुँचने के लिये इस पहाड़ी नदी यानि यहाँ की भाषा में कहें तो लाचुंग चू (Lachung Chu) को पार करना था। वहीं से इस ठुमकती चू को कैमरे से छू लिया। गर्म पानी का स्पर्श कर हम वापस लाचुंग लौट चले।



भोजन के बाद वापस गंगतोक की राह पकड़नी थी। गंगतोक के रास्ते में तीस्ता घाटी की अंतिम झलक पाने के लिये हम गाड़ी से उतरे। काफी ऊँचाई से ली गयी इस तसवीर में घुमावदार रास्तों के जाल के साथ नीचे बहती हुई तीस्ता को आप देख सकते हैं। तीस्ता से ये इस सफर की आखिरी मुलाकात तो नहीं पर उसकी अंतिम तसवीर ये जरुर थी। सांझ ढ़लते ढ़लते हम गंगतोक में कदम रख चुके थे।
अपना अगला दिन नाम था सिक्किम के सबसे लोकप्रिय पड़ाव के लिये जहाँ प्रकृति अपने एक अलग रूप में हमारी प्रतीक्षा कर रही थी।


अगली सुबह पता चला कि भारी बारिश और चट्टानों के खिसकने की वजह से नाथू-ला का रास्ता बंद हो गया है। मन ही मन मायूस हुये कि इतने पास आकर भी भारत-चीन सीमा को देखने से वंचित रह जाएँगे। पर बारिश ने जहाँ नाथू-ला (Nathu La)जाने में बाधा उत्पन्न कर दी थी तो वहीं ये भी सुनिश्चित कर दिया था कि हमें सिक्किम की बर्फीली वादियाँ के पहली बार दर्शन हो ही जाएँगे। इसी खुशी को मन में संजोये हुये हम छान्गू या Tsomgo(अब इसका उच्चारण मेरे वश के बाहर है, वैसे भूतिया भाषा में Tsomgo का मतलब झील का उदगम स्थल है ) की ओर चल पड़े। ३७८० मीटर यानि करीब १२००० फीट की ऊँचाई पर स्थित छान्गू झील गंगतोक से मात्र ४० कि.मी. की दूरी पर है ।


गंगतोक से निकलते ही हरे भरे देवदार के जंगलो ने हमारा स्वागत किया। हर बार की तरह धूप में वही निखार था । कम दूरी का एक मतलब ये भी था की रास्ते भर जबरदस्त चढ़ाई थी। ३०कि.मी. पार करने के बाद रास्ते के दोनों ओर बर्फ के ढ़ेर दिखने लगे। मैदानों में रहने वाले हम जैसे लोगों के लिये बर्फ की चादर में लिपटे इन पर्वतों को इतने करीब से देख पाना अपने आप में एक सुखद अनुभूति थी। पर ये तो अभी शुरुआत थी। छान्गू झील (Changu Lake) के पास हमें आगे की बर्फ का मुकाबला करने के लिये घुटनों तक लम्बे जूतों और दस्तानों से लैस होना पड़ा ।

दरअसल हमें बाबा हरभजन सिंह मंदिर (Baba Mandir) तक जाना था जो कि नाथू-ला और जेलेप-ला के बीच स्थित है। ये मंदिर २३ वीं पंजाब रेजीमेंट के एक जवान की याद में बनाया है जो ड्यूटी के दौरान इन्हीं वादियों में गुम हो गया था । बाबा मंदिर की भी अपनी एक रोचक कहानी है जिसकी चर्चा हाल-फिलहाल में हमारे मीडिया ने भी की थी ।

छान्गू से १० कि.मी. दूर हम नाथू ला के इस प्रवेश द्वार की बगल से गुजरे । हमारे गाइड ने इशारा किया की सामने के पहाड़ के उस ओर चीन का इलाका है। मन ही मन कल्पना की कि रेड आर्मी कैसी दिखती होगी, वैसे भी इसके सिवाय कोई चारा भी तो ना था!


थोड़ी ही देर में हम बाबा मंदिर के पास थे। सैलानियों की जबरदस्त भीड़ वहाँ पहले से ही मौजूद थी । मंदिर के चारों ओर श्वेत रंग में डूबी बर्फ ही बर्फ थी । उफ्फ क्या रंग था प्रकृति का, जमीं पर बर्फ की दूधिया चादर और ऊपर आकाश की अदभुत नीलिमा, बस जी अपने आप को इसमे. विलीन कर देने को चाहता था। इन अनमोल लमहों को कैमरे में कैद कर बर्फ के बिलकुल करीब जा पहुँचे।

हमने घंटे भर जी भर के बर्फ पर उछल कूद मचाई । ऊँचाई तक गिरते पड़ते चढ़े और फिर फिसले। अब फिसलने से बर्फ भी पिघली। कपड़ो की कई तहों के अंदर होने की वजह से हम इस बात से अनजान बने रहे कि पिघलती बर्फ धीरे-धीरे अंदर रास्ता बना रही है। जैसे ही इस बर्फ ने कपड़ों की अंतिम तह को पार किया, हमें वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ और हम वापस अपनी गाड़ी की ओर लपके। कुछ देर तक हमारी क्या हालत रही वो आप समझ ही गये होंगे:p । खैर वापसी में भोजन के लिये छान्गू में पुनः रुके। भोजन में यहाँ के लोकप्रिय आहार मोमो (Momo) का स्वाद चखा।

भोजन कर के बाहर निकले तो देखा कि ये सुसज्जित यॉक (Yalk) अपने साथ तसवीर लेने के लिये पलकें बिछाये हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब हमें भी इस यॉक का दिल दुखाना अच्छा नहीं लगा सो खड़े हो गए गलबहियाँ कर!:) नतीजा आपके सामने है।
अगला दिन गंगतोक में बिताया हमारा आखिरी दिन था !

सिक्किम प्रवास के आखिरी दिन हमारे पास दिन के ३ बजे तक ही घूमने का वक्त था। तो सबने सोचा क्यूँ ना गंगतोक में ही चहलकदमी की जाये। सुबह जलपान करने के बाद सीधे जा पहुँचे फूलों की प्रदर्शनी देखने।

वहाँ पता चला कि इतने छोटे से राज्य में भी ऑर्किड (Orchids) की ५०० से ज्यादा प्रजातियाँ पाई जातीं हैं जिसमें से कई तो बेहद दुर्लभ किस्म की हैं। इन फूलों की एक झलक हमें चकित करने के लिये काफी थी। भांति भांति के रंग और रुप लिये इन फूलों से नजरें हटाने को जी नहीं चाहता था। ऐसा खूबसूरत रंग संयोजन विधाता के आलावा भला कौन कर सकता है।

फूलों की दीर्घा से निकल हमने रोपवे की राह पकड़ी। ऊँचाई से दिखते गंगतोक की खूबसूरती और बढ़ गई थी। हरे भरे पहाड़, सीढ़ीनुमा खेत, सर्पाकार सड़कें और उन पर चलती चौकोर पीले डिब्बों जैसी दिखती टैक्सियाँ ।

रोपवे से आगे बढ़े तो सिक्किम विधानसभा भी नजर आई। रोपवे से उतरने के बाद बौद्ध स्तूप की ओर जाना था । स्तूप तक की चढ़ाई-चढ़ते चढ़ते हम पसीने से नहा गए। यहाँ की भाषा में स्तूप को Do-Drul-Chorten कहते हैं। इस स्तूप के चारों ओर १०८ पूजा चक्र हैं जिन्हे बौद्ध भक्त मंत्रोच्चार के साथ घुमाते हैं।
वापसी का सफर ३ की बजाय ४ बजे शुरू हुआ। गंगतोक से सिलीगुड़ी का सफर चार घंटे मे पूरा होता है। इस बार हमारा ड्राइवर बातूनी ज्यादा था और घाघ भी। टाटा सूमो में सिक्किम में १० से ज्यादा लोगों को बैठाने की इजाजत नहीं है पर ये जनाब १२-१४ लोगों को उस में बैठाने पर आमादा थे। खैर हमारे सतत विरोध की वजह से ये संख्या १२ से ज्यादा नहीं बढ़ पाई । सिक्किम में कायदा कानून चलता है और लोग बनाए गए नियमों का सम्मान करते हैं पर जैसे ही सिक्किम की सीमा खत्म होती है कायदे-कानून धरे के धरे रह जाते हैं। बंगाल आते ही ड्राइवर की खुशी देखते ही बनती थी। पहले तो सवारियों की संख्या १० से १२ की और फिर एक जगह रोक कर सूमो के ऊपर लोगों को बैठाने लगा। पर इस बार सब यात्रियों ने मिलकर ऐसी झाड़ पिलायी की वो मन मार के चुप हो गया।

उत्तरी बंगाल में घुसते ही चाँद निकल आया था। पहाड़ियों के बीच से छन कर आती उसकी रोशनी तीस्ता नदी को प्रकाशमान कर रही थी। वैसे भी रात में होने वाली बारिश की वजह से चाँद हमसे लाचेन और लाचुंग दोनों जगह नजरों से ओझल ही रहा था, जिसका मुझे बेहद मलाल था। शायद यही वजह थी कि चाँदनी रात की इस खूबसूरती को देख मन में ऍतबार साजिद की ये पंक्तियाँ याद आ रही थीं

वहाँ घर में कौन है मुन्तजिर कि हो फिक्र दर सवार की
बड़ी मुख्तसर सी ये रात है, इसे चांदनी में गुजार दो
कोई बात करनी है चाँद से, किसी शाखसार की ओट में
मुझे रास्ते में यहीं कहीं किसी कुन्ज-ए -गुल में उतार दो

पर यहाँ उतरने की कौन कहे स्टेशन समय पर पहुँचने की समस्या थी। गंगतोक के बाहर सड़क बनने की वजह से हमें १ घंटे रुकना पड़ा था। अब हमारे पास मार्जिन के नाम पर आधे घंटे ही थे। यानि ९.३० बजे की ट्रेन के पहले अपनी क्षुधा शांत करने की योजना हम ठंडे बस्ते में डाल चुके थे। घाटी पार करते ही चालक ने हमारी परेशानी देखते हुये टाटा सूमो की गति ७५ किमी/ घंटे कर दी थी । पर भगवन हमारी वापसी की यात्रा को और रोमांचक बनाने पर तुले थे। सो सिलिगुड़ी के ठीक २५ किमी पूर्व ही सूमो का एक टॉयर जवाब दे गया। २० मिनट टाँयर बदली में गये । सबके चेहरे पर तनाव स्पष्ट था। पर चालक की मेहरबानी से गाड़ी आने के ठीक ५ मिनट पूर्व हम भागते दौड़ते प्लेटफार्म पर पहुँचे।


चंद दिनों की मधुर स्मृतियों को लिये हमारा समूह वापस लौट रहा था कुछ अविस्मरणीय छवियों के साथ । उनमे एक छवि इस बच्चे की भी थी जिसे हमने चुन्गथांग में खेलते देखा था!

सिक्किम के सफर का पटाक्षेप करने से पहले तहे दिल से सलाम हमारे ट्रेवेल एजेन्ट प्रधान को जिसने बंध गोभी की सब्जी खिला खिला कर ना केवल १५००० फीट पर भी हमारे खून में गर्मी बनाए रखी :) बल्कि रास्ते भर अपने हंसोड़ स्वभाव से माहौल को भी हल्का फुलका बनाये रखा।

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इतने लंबी पोस्ट को अगर आप छोटी-छोटी कड़ियों में पढ़ना चाहें तो इस जाल पृष्ठ पर जाएँ।

10 comments:

अनूप शुक्ल said...

अद्भुत! फोटो भी मजेदार हैं।

munish said...

mast fotoz! which camera manish?
come to Kashmir at maykhaana.

राकेश जैन said...

sundar yatra vritant, photography is attractive..nice Manish Ji.

Dr.Parveen Chopra said...

इस से बढिया यात्रा वृत्तांत तो मेरे भाई मैंने आज तक न तो किसी किताब में ही देखा और न ही पढ़ा। आप ने इतनी मेहनत की इस सब को हमारे तक पहुंचाने में। वो खाई वाली बात से तो भाई मुझे हमारी मनाली यात्रा याद आ गई...हम ने भी ठीक आप की ही तरह कईं बार सब कुछ राम-भरोसे छोड़ दिया था...जाप चालू रखा था. फोटो इतनी बेहतरीन कि कहने के लिये शब्द नहीं हैं.....वो आखिरी फोटो में नन्हा मुन्ना बच्चा तो देख कर एक बार ऐसा लगा कि उस के गाल पर हल्की सी प्यार भरी थपकी दूं......
अच्छा एक बात है आगे से कभी भी कहीं जाने का प्रोग्राम हो तो मुझे भी पहले से बता दिया करें...मुझे भी अगर छुट्टी की समस्या नहीं हुया करेगी तो आप केसाथ ही हो लिया करूंगा।
एक बार फिर से बहुत बहुत धन्यवाद।
simply marvellous and so enchanting !!...मैं भी इन कुदरती फिज़ाओं का शौदाई हूं।

अभिषेक ओझा said...

आपने हमारी सिक्किम यात्रा की यादें ताजी कर दी... बहुत खूबसूरत... सिक्किम और आपकी पोस्ट दोनों... निर्विवाद !

Udan Tashtari said...

यह बहुत उम्दा कार्य किया जो इन्हें सबको एक जगह लेते आये. बधाई.

DR.ANURAG ARYA said...

आहा ठंड सी .लगने लगी ओर खुमारी सी छा गई ,हम कम्बख्त या मरीजो मे सर फोड़ रहे है ओर आप कहाँ कहाँ के खाजानो से फोटो निकाल रहे है.......मैं आ रहा हूँ सिक्किम..........

Dawn....सेहर said...

WOW...Kanchanjanga ke baare mein jitna padha tha oos se adhik yahaan paaya....prakriti ki sundarta ka ek aur varnan....bahut khoob! All pics are beautiful
Cheers

royalguy said...

Bahut bahut dhanyabad humay bhi bhabnao kai jariyay sikkim ki yatra karnay ka ,suna bahut tha ab mahsoos karaya aap kay shabdo na .
Thax a lot for all u did for community.....Ravi saxena ,Saudi Arabia

shakir azim said...

Dear Manish jee,
This is the first I visited ur page.It is too nice to describe in words and the photography is marvellous.Believe me I'll be visiting this site regularly.
Nice work,Keep it up.

Shakir Azim