Monday 11 May 2009

आइए साथ हो लें गर्मी की एक दोपहर में नए पटना से पटना साहेब के सफ़र तक...

पिछले महिने पटना में तीन चार दिन की छुट्टियों पर जाना हुआ था। कई दिनों से बेटा सवाल कर रहा है कि पापा मंदिर और मस्जिद तो समझ आ गया पर ये गुरुद्वारा क्या होता है? पहली क्लॉस की परीक्षा में तो स्पेलिंग रट रटा कर और चित्र दिखा कर बेड़ा पार हो गया है पर पटना में इस सवाल की पुनरावृति होने से अचानक ख़्याल आता है कि अरे अर्सा हो गया तख़्त हर मंदिर साहब (Takht Harmandir Saheb) गए हुए। क्यूँ ना पुत्र की जिज्ञासा शांत करने के साथ साथ इस पवित्र स्थल की सैर कर ली जाए।

मेरा घर पटना के पश्चिमी किनारे पर है जबकि तख्त हरमंदिर साहब पुराने पटना के पूर्वी छोर पर है। इसलिए घर से सिटी के इस संकीर्ण इलाके में जाना आज के पटना और पुराने पटना के बदलते रंगों को देखने का एक अच्छा मौका प्रदान करता है। तो आज आपको भी ले चलता हूँ इस सफ़र पर ताकि पटना शहर की कुछ झांकियों से आप भी रूबरू हो जाएँ...

अप्रैल की तेज दोपहरी है। खाने के बाद एक घंटे के आराम के बाद हम निकल पड़े हैं पटना सिटी की ओर। कुछ ही देर में हम नए पटना के मुख्य मार्ग बेली रोड (Bailey Road) पर हैं। बेली रोड पश्चिमी पटना या नए पटना की पहचान है। चिड़ियाघर, सचिवालय, हाई कोर्ट, प्लेनेटोरियम, संग्रहालय अपने आंगुतकों के लिए सब इसी सड़क पर आश्रित हैं।

चित्र सौजन्य - पटना डेली. कॉम

पटना हाई कोर्ट (Patna High Court) अब भी मुझे विभिन्न राज्यों में देखे गए उच्च न्यायालयों में भव्य लगता है। पास ही पटना वीमेंस कॉलेज है जिसका शुमार महिलाओं के लिए बिहार के सबसे अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में होता है।
दीदी जब यहाँ पढ़ती थीं तो मैं कॉलेज में एक बार किसी खेल प्रतियोगिता को देखने के लिए अंदर गया था और लड़कियों ने मेरी और मेरे दोस्तों की अच्छी खासी क्लॉस ले ली थी। बाद में दीदी यहीं पढ़ती है कहकर उनसे जान छुड़ाकर भाग लिये थे।
उस दिन के बाद फिर कभी कॉलेज के अंदर प्रवेश का साहस नहीं कर पाए।
चित्र सौजन्य : विकीपीडिया

अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर के नाम पर बनी ये सड़क कई साल पहले ही जवाहर लाल नेहरू मार्ग में तब्दील हो गई थी पर आम जनता ने कभी बेली रोड को अपनी जुबान से हटाया नहीं। इस इलाके से गुजरना, मेरे पटना के आफिसर्स हॉस्टल में बिताए १५ सालों की छवियाँ को फिर से पुनर्जीवित कर देता है।

सचिवालय के पास ही एक पुरानी रेलवे लाइन (शायद १०-१५ किमी लंबी) बेली रोड को क्रास करती है जहाँ हमारी गाड़ी रुक गई है। बचपन और किशोरावस्था में गुजारे अपने पन्द्रह सालों के दौरान इस फाटक रहित रेलवे क्रासिंग से मैंने कभी किसी गाड़ी को गुजरते नहीं देखा। पर आज यहाँ से लालू जी की दया से एक रेलगाड़ी गुजर रही है, जो पटना को दीघा से जोड़ती है। दीघा की पुरानी पहचान बॉटा की फैक्ट्री से थी जो अब दानापुर से सटे लालू के प्रभाव वाले इलाके के तौर पर हो रही है। लोग कहते हैं इस गाड़ी में टिकट खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। हाल ही में पिता के एक मित्र घूमने घामने के ख्याल से इसका टिकट लेने पहुँचे तो टिकट खिड़की पर उँघता बाबू आँखें फाड़ कर कौतुक से देखने लगा कि ये अजूबा सवारी कहाँ से आ गई। पता नहीं अगले साल क्या हो। बिहार में इस चुनाव में माहौल ऍसा है कि कहीं लालू जी का ही टिकट ना कट जाए।

नए बने प्लेनेटोरियम और मुख्य कोतवाली को छोड़ते हुए हम जा पहुँचे हें पटना के व्यस्ततम चौराहे के पास। डाक बँगला के चौराहे पर दिन के समय भी भीड़ है। बस इतनी कृपा हे कि जॉम नहीं है। वैसे भी इस इलाके के खासमखास मार्केटिंग कॉम्पलेक्स हीरा प्लेस (Hira Place) और मौर्य लोक ( Maurya Lok ) के होने से इस भीड़ भाड़ से निज़ात पाना निकट भविष्य में आसान नहीं है। चौराहे से बेली रोड को छोड़ते हुए हम पटना के नृत्य कला मंदिर से गुजर रहे हैं। बचपन के दिनों में रेडिओ स्टेशन से लगे इस अहाते में कुछ कार्यक्रमों को देखने का अवसर मिला है। इमारत का नवीनीकरण होने से इसमें नई जान आई दीखती है।

चित्र सौजन्य : विकीपीडिया

मौर्य होटल, संत जेवियर्स, गोलघर बाँकीपुर हाई स्कूल, गाँधी संग्रहालय के पास से गुजरते हुए हम अब पटना के विशाल गाँधी मैदान का चक्कर लगा रहे हैं। कभी इसी मैदान में कक्षा चार में करीब पाँच किमी पैदल चलते हुए स्कूल की परेड में भाग लेने आया था। वो आधी रात भी यहीं कटी थी जब दशहरा में सालाना होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में पॉस नहीं मिलने के कारण बाहर बैठना पड़ा था। आज इसी मैदान के बगल में बिस्कोमान भवन के ऊपर एक रिवाल्विंग रेस्ट्राँ खुल गया है जो आज के पटना की नई पहचान है।

गाँधी मैदान का चक्कर खत्म करते ही हम एक दूसरी ऍतिहासिक सड़क की ओर बढ़ रहे हैं जो पुराने पटना यानि पटना सिटी का प्रवेश द्वार है। इस सड़क का नाम है अशोक राजपथ (Ashok Rajpath)। ये सड़क पटना विश्वविद्यालय के सभी मुख्य शिक्षण संस्थानों के लिए प्रवेश मार्ग है। इनमें से अधिकांश अंग्रेजों के जमाने के बने हैं। गंगा नदी के समानान्तर चलती ये सड़क बी एन कॉलेज, पटना कॉलेज, मेडिकल कॉलेज (PMCH),साइंस कॉलेज , इंजीनियरिंग कॉलेज (NIT, Patna) होती हुई पटना सिटी की ओर बढ़ जाती है। अशोक राजपथ पर ही दुर्लभ पुरानी पांडुलिपियों से भरपूर खुदाबख्श लाइब्रेरी , बिहार का सबसे पुराना रोमन कैथलिक चर्च पादरी की हवेली, और मुगल सम्राट जहाँगीर के बेटे परवेज़ की बनाई पत्थर की मस्जिद भी है। इंजीनियरिंग कॉलेज से आगे का रास्ता राज पथ से ज्यादा जन पथ हो जाता है। इसलिए पटना के बाशिंदे भी अपनी इन प्राचीन धरोहरों की ओर बिड़ले ही रुख करते हैं। रिक्शों और ठेलों से पटी सड़क के साथ किरासन तेल पर चलते आटो वस्तुतः आपकी नाम में दम करना वाले मुहावरे को चरितार्थ कर देते हैं।

छोटी पाटन देवी के मंदिर, गाय घाट के गुरुद्वारे की बगल से होते हुए हम जर्जर हो रहे करीब 5.5 किमी भारत के सबसे लंबे सेतु, महात्मा गाँधी सेतु (जो पटना को उत्तर बिहार से जोड़ता है) के नीचे से गुजर रहे हैं। ये पुल सरकार को भारी राजस्व प्रदान करता है। पर पिछले कुछ सालों से इसके खंभों में निरंतर आती दरारों से इंजीनियर परेशान हैं।
चित्र सौजन्य : विकीपीडिया

हरमंदिर साहब अभी भी कुछ दूरी पर है। पटना साहिब का रेलवे चौक आने पर हमें लगता है कि कहीं गुरुद्वारा पीछे तो नहीं छूट गया पर सड़क चलते राहगीर हमें आश्वस्त करते हैं कि हम सही रास्ते पर हैं। कुछ क्षणों में अचानक ही हम हरमंदिर साहब के सामने हैं। डेढ़ घंटे के लगातार सफ़र के बाद जो दृश्य हमें देखने को मिला उसे मेरे कैमरे की नज़रों से आप देख पाएँगे अगली पोस्ट में...

16 comments:

रंजन said...

एक दो बार पटना जाना हुआ... लिची बहुत मजेदार मिलती है..

नीरज गोस्वामी said...

आपने पटना देखने की हसरत पूरी कर दी...नयनाभिराम चित्र और उतना ही दिलकश वर्णन...जैसे सोने पर सुहागा...बहुत आनंद आया...अगली किश्त का बेसब्री से इंतज़ार है...
नीरज

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पटना की सैर यही बैठे बैठे हो गयी जी ...एक अलग ही रूप इसको पढ़ कर चित्र देख कर सामने आया ..शुक्रिया

विनीता यशस्वी said...

Shaandaar yatra aur utne hi shandaar tasveeren...

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प....अब किताब छपवा ही लो.......

Sachi said...

बहुत ही सुन्दर यात्रा वृतांत आपने पेश किया है.

पटना के कई रूप तो मेरे आँखों में बसे हुए हैं, उनमे से कई के आपने दर्शन करवा दिए |

आदमी पलायन कई कारणों से करता है, शिक्षा, और रोजगार उनमें से बहुत महत्वपूर्ण हैं.

वो हमीं न रहे, तो वो जगह वैसी कैसी होगी?

Abhishek Mishra said...

Badalte Patna ki bhi jhalak mil gai is post se.

"अर्श" said...

PATNA BHART KE ETIHAASIK SHAHARO ME SE EK HAI ... PURV ME YE MAGADH KE NAAM SE JAANAA JAATA HAI BAHOT HI KHUSURATI SE AAPNE IS DHAROHAR KO CHITRIT KIYA HAI ... YAHAAN AUR BHI DHER SAARI JAGAHEN HAI JO DEKHNE LAAYAK HAI... BAHOT BAHOT BADHAAYEE AAPKO... IS POST SE LOGON KE DIMAAG ME BASE PATNA KE BAARE ME JO PERCEPTION HAI WO THODA CHANGE HOGA...

ARSH

अभिषेक ओझा said...

जानी पहचानी जगहें... बहुत अच्छा लगा.

Manish Kumar said...

रंजन बड़े सही समय पर आपने लीची को याद किया। अभी उसका सीजन शुरु हुआ है।

अर्श आपने सही कहा पटना में और भी बहुत कुछ और भी देखने को है। जैसे अगम कुआँ जहाँ कहा जाता है कि अशोक ने अपने ९९ भाइयों को मार कर फिकवा दिया था, कुम्हरार जहाँ अभी भी मगध कालीन अवशेषों की झलक मिलती है या फिर सचिवालय के पीछे शहीदों की स्मृति में बना स्मारक। इस प्रविष्टि में सिर्फ उन स्थानों का जिक्र कर पाया हूँ जो बेली रोड से पटना सिटी के रास्ते में आते गए।

chetna said...

manish g,
aap patna jayein to patna market, hathua market, nala road ka chudi bazar, maurya complex bhi jarur jayei, aour haan, new market ki galiyon mein banne vali lavanlatika, maurya lok ka fast food, patna market ki aaloo tikki...inka bhi lutf uthayein taki hamein aapke blog se yeh jaankari mil sake ki kya is swad mein bhi koi badlav aaya hai.bhut din baad apke bahane patna ghum aayee. dhanyavaad.
chetna

सुरेन्द्र Verma said...

Aapne kadi mehnat ki iske liye bahu-bahut badhai.

नितिन व्यास said...

पटना सफर अच्छा लगा!!

P.N. Subramanian said...

गांधी मैदान बहुत ही विशाल दिख रहा है. सचित्र पटना की सैर के लिए आभार

Arvind Mishra said...

वाह पटना !

शाश्‍वत शेखर said...

पुराने दिन याद आ गये।

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