Tuesday 13 October 2009

डाँगमाल मगरमच्छ प्रजनन केंद्र और कथा गौरी की...

सुबह की सैर के बाद ज़ाहिर है पेट में चूहे कूदने लगे थे। सो जम कर नाश्ता करने के बाद हम डाँगमाल के मगरमच्छ प्रजनन केंद्र (Salt Crocodile Breeding Centre) और संग्रहालय की ओर चल दिये। डाँगमाल में वन विभाग के गेस्ट हाउस के आलावा भी निजी कंपनी सैंड पेबल्स टूर एवम ट्रैवेल्स के कॉटेज उपलब्ध हैं। इन गोलाकार झोपड़ीनुमा कॉटेज को देख कर बचपन की वो ड्राइंग क्लास याद आ जाती है जब झोपड़ी का चित्र बनाने के लिए कहने के लिए हम तुरत इसी तरह की रेखाकृति खींचते थे।


इस काँटेज के पास ही एक छोटा सा संग्रहालय है जहाँ मैनग्रोव में पाए जाने वाले जीवों के अस्थि पंजर को सुरक्षित रखा गया है। संग्रहालय का मुख्य आकर्षण नमकीन पानी में पाए जाने वाले मगरमच्छ का अस्थि पिंजर है।


समुद्र से सटे इन डेल्टाई इलाकों में पाए जाने वाले ज्यातर जीव जंतु अपना आधा जीवन पानी और आधा जमीन पर बिताते हैं। मैनग्रोव के जंगल यहाँ के प्राणियों की भोजन श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं।



ये जंगल बड़ी मात्रा में जैविक सामग्री का निर्माण करते हैं जो सैकड़ों छोटे जीवों का आहार बनते हैं। ये खाद्य श्रृंखला छोटी और बड़ी मचलियों से होती हुई कछुए और मगरमच्छ जैसे बड़े जीवों तक पहुंच जाती है। मगरमच्छ की भयानक दंतपंक्तियों को देखने के बाद हमने सोचा कि क्यूँ ना अब साक्षात एक मगरमच्छ का दर्शन किया जाए।

संग्रहालय से सौ दो सौ कदमों की दूरी पर हमें ये मौका मिल गया। तार की जाली के पीछे का घर गौरी का था। गौरी इस प्रजनन केंद्र की पहली पीढ़ी से ताल्लुक रखती है। १९७५ में इस प्रजनन केंद्र में लाए गए अंडों को कृत्रिम ढंग से निषेचित कर इसका जन्म हुआ था। दरअसल १९७५ में यूएनडीपी के विशेषज्ञ डॉ एच आर बस्टर्ड (Dr. H.R.Bustard) ने यहाँ नमकीन पाने वाले मगरमच्छ की लुप्त होती प्रजाति को पालो और छोड़ो (Rear & Release) कार्यक्रम के तहत बचाने का प्रयास किया। करीब बारह साल की अवधि तक चले इस कार्यक्रम के दौरान मगरमच्छों की संख्या यहाँ 96 से बढ़कर 1300 के ऊपर हो गई। तो बात हो रही थी गौरी की। गौरी का ये नामाकरण उसके हल्के रंग की वज़ह से हुआ है। गौरी को परिवार शुरु के लिए दो बार उसके बाड़े में नर मगरमच्छों को छोड़ा गया। पर गौरी को उनका साथ कभी नहीं रास आया। साथियों के साथ कई बार उसकी जम कर लड़ाई हुई। ऍसे ही एक युद्ध में उसे अपनी दायीं आँख गँवानी पड़ी। तब से वो अपने इस बाड़े में अकेली रहती है।

स्वभाव से मगरमच्छ सुस्त जीव होते हैं। गौरी को नजदीक से देखने के लिए हम उसके बाड़े के अंदर गए। गौरी को पानी से बाहर निकालने के लिए एक जीवित केकड़ा पानी के बाहर फेंका गया। कुछ ही देर में गौरी ने हमारी आँखों के सामने उस केकड़े का काम तमाम कर दिया और फिर एक गहरी शांति उसके चेहरे पर छा गई।



गौरी को उसी हालत में छोड़कर हम मगरमच्छ के शावकों को देखने आगे बढ़ गए। कीचड़ में लोटते ये शावक किसी भी तरह से भोले नहीं लग रहे थे इसलिए जब हमारे गाइड ने इन्हें हाथ से उठा कर देखने की पेशकश की तो हम सब एकबारगी सकपका गए। हमारी झिझक को देखते हुए वहाँ के एक कर्मचारी ने एक शावक को हाथ से उठाया और हम सब ने बारी बारी उसे छू भर लिया।




मगरमच्छों की दुनिया से बाहर निकलने के बाद हमें भितरकनिका के अपने आखिरी पड़ाव इकाकुला (Ekakula) के समुद्री तट पर जाना था। इस श्रृंखला की समापन किश्त में इकाकुला तक की यात्रा आप तक पहुँचाई जाएगी। पर उससे पहले मुसाफ़िर हूँ यारों के पाठकों को दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएँ !

इस श्रृंखला में अब तक

  1. भुवनेश्वर से भितरकनिका की सड़क यात्रा
  2. मैनग्रोव के जंगल, पक्षियों की बस्ती और वो अद्भुत दृश्य
  3. भितरकनिका की चित्रात्मक झाँकी : हरियाली और वो रास्ता ...
  4. डाँगमाल के मैनग्रोव जंगलों के विचरण में बीती वो सुबह.....

6 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

Bahut hi sundar tarike se sabhi chitron ko prstut kiya aapne..
kamal ka yatra vivran...dhanywaad manish ji

मुनीश ( munish ) said...

Gauri.... a reptile, a croc precisely ? How obnoxious ! These conservationists have gone nuts perhaps. A nice , academic write up otherwise. Thnx !

विनीता यशस्वी said...

achhi jankariyo bhari yatra rahi hai apki...

Magrmachho ko dekh ke mujhe apni Chennai yatra ki yaad aa gayi...

सुशील कुमार छौक्कर said...

गौरी के बारे में जानकर अच्छा लगा। वैसे हम सोच कुछ और रहे थे:) जानकारी से भरपूर पोस्ट। फोटो बेहतरीन है।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगी आप की यात्रा, वेसे गोरी की आंख के बारे पढ कर अच्छा नही लगा, एक बात का पता चल गया कि फ़ीमेल चाहे इंसानो मै हो या फ़िर जानवरो मे लडाकी जरुर होती है(अरे सभी नही) कोई कोई,
चित्र बहुत अच्छे लगे, ओर लेख ओर भी सुंदर
धन्यवाद

अभिषेक ओझा said...

मुझे तो फोटो में ही देखकर डर लग रहा है :) दूसरी फोटो देखकर भी मुझे बायलोजी की लैब याद आ गयी. और पहली से तो आपने झोपडी बनाना याद दिलाया ही.

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