Friday, November 4, 2011

रंगीलो राजस्थान : आइए चलें उदयपुर के सिटी पैलेस में !

'उदयपुर का सिटी पैलेस', इसी महल को दिखाने का वादा किया था ना पिछली बार। पर कार्यालय की व्यस्तताओं और दीपावली की छुट्टियों के बीच लिखना संभव नहीं हो पाया। पर आज आपको मैं शिशोदिया राजपूत घराने के महाराणा उदय सिंह द्वारा बनवाए गए इस महल की सैर अवश्य कराऊँगा। 
चित्तौड़गढ़ के होते हुए आख़िर महाराणा उदय सिंह को इस महल को बनवाने की जरूरत क्यों आन पड़ी? 1537 में महाराणा ने जब चित्तौड़गढ़ का किला सँभाला तो दो परेशानियों से उनका सामना हुआ। दरअसल पहाड़ी पर स्थित चित्तौड़गढ़ के चारों ओर मैदानी इलाका है। मुगल सेनाओं द्वारा युद्ध में इस किले की घेराबंदी कर रसद पानी के मार्ग को अक्सर अवरुद्ध कर दिया जाता। दूसरे चित्तौड़ में पानी की बड़ी समस्या थी। कहते हैं कि महाराणा 1559 में अपने सैनिकों के साथ अरावली से लगे जंगलों में शिकार करने आए। पिछोला झील से सटी पहाड़ी पर उन्हें एक महात्मा मिले जिन्होंने उन्हें उसी इलाके में राजधनी बनाने का मशवरा दिया। राणा को महात्मा की बात जँच गयी क्यूँकि ये जगह चारों ओर से पहाड़ियों , घने जंगलों और झील से घिरी हुई थी। सन 1559 में उदयपुर के सिटी पैलेस की नींव पड़ी। फिर अगले तीन सौ सालों तक शिशौदिया घराने के सूर्यवंशी नरेशों  ने इस महल का विस्तार किया।


इस महल के तीन मुख्य द्वार हैं। जिस रास्ते सारे पर्यटक सिटी पैलेस की ओर जाते हैं वो रास्ता जगदीश मंदिर की ओर से होता हुआ बड़ी पोल (यानि द्वार) की ओर निकलता है।  इसके आगे सबसे आलीशान त्रिपोलिया गेट है। त्रिपोलिया नाम तीन मेहराबों से बने होने के कारण पड़ा। वैसे ये द्वार काफी बाद में यानि सन1725 में बनाया गया। कहते हैं इसी द्वार के पास हाथियों की लड़ाई हुआ करती थी। इसके आलावा पैलेस से बाहर जाने के लिए इसकी दाहिनी तरफ एक और छोटा सा द्वार है जिसे हाथी पोल कहते हैं। नीचे चित्र में आप देख रहे हैं बड़ी पोल और ठीक उसके आगे है त्रिपोलिया।


मेवाड़ के महाराणा सूर्य के उपासक थे। सिटी पैलेस के निचले तल के चौकोर कक्ष में सूर्य की किरणों के बीच महाराणाओं की मुखाकृति को चमचमाते प्रतीक चिन्ह के रूप में स्थापित कर दिया गया है। शिशोदिया वंश के प्रतीक इन चिन्हों को सूर्य चोपर का नाम दिया गया था। सेनाओं के ध्वजों में भी इस तरह के चिन्ह का प्रयोग होता था।

महल के अंदर के संग्रहालय में मेवाड़ राजाओं द्वारा प्रयुक्त हथियारों को रखा गया है। संग्रहालय में घुसते ही सबसे पहले नजर पड़ती है महाराणा प्रताप द्वारा प्रयुक्त तलवारें और उनके बख्तरबंद पर। महाराणा सौ किलो से ज्यादा के अस्त्र शस्त्र का भार ले कर कैसे बहादुरी से युद्ध करते होंगे ये सोचकर ही विस्मय होता है।
महल की संकरी सीढ़ियों से होते हुए हम महल के सबसे ऊपरी हिस्से में जा पहुँचे। ऊपर का हिस्से में मुगलकालीन शैली में बना आँगन है जो वर्गाकार हिस्से में फैला हुआ है। इस आँगन के बीचों बीच हरा भरा उद्यान और पानी का हौदा है। इसका प्रयोग होली के समय होता था।  दरअसल  उद्यान से जुड़े इस इलाके को अमर विलास के नाम से जाना जाता था। अमरविलास से जुड़ा एक महल है जिसे बड़ा  महल कहते हैं। इतनी ऊँचाई पर इन ऊँचे ऊँचे पेड़ों को देखकर आश्चर्य होता है कि आखिर महल की छत पर ये पेड़ कैसे उग आए? इस प्रश्न का उत्तर महल की नींव को देखकर समझा जा सकता है। दरअसल बड़ी महल व उससे जुड़ा उद्यान, महल के अन्य हिस्सों की अपेक्षा 27 मीटर ऊँची चट्टान पर बना है जिससे कि ये आभास होता है कि हम महल के तीसरे या चौथे तल्ले पर हैं।

बड़ा महल के एक कक्ष में ये पिंजरे रखे गए हैं जिसमें उस ज़माने में काम आने वाले डाक कबूतर रहा करते थे।


सिटी पैलेस के तमाम दरवाजों , झरोखों में रंगीन शीशों का प्रयोग हुआ है। कक्ष की दीवालों पर जगह जगह मिनियेचर पेटिंग्स भी दिखाई पड़ती हैं। इन चित्रों में सामान्यतः शिकार, हाथियों की लड़ाई, राधा कृष्ण के प्रसंग को दर्शाया गया है।

बड़ा  महल से नीचे उतरते हुए हम राजसी वैभव से भरपूर, कई महल दिखाई पड़ते हैं। मेवाड़ के महाराणाओं ने समय समय पर इन महलों का इस तरह से निर्माण किया ताकि उन्हें उनके बनाने वाले के साथ वर्षों तक याद किया जा सके। सबसे पहले बात करते हैं माणिक महल की। इसे रूबी पैलेस भी कहा जाता है क्यूँकि इसके अंदर की दीवालों में गहरे लाल रंग के माणिकों का बहुत प्रयोग हुआ है। महल के अंदर सैलानियों को जाने की इज़ाजत नहीं है। लोग बाग पल भर झरोखे से ही इसकी चकाचौंध का नज़ारा लेकर आगे बढ़ चलते हैं।

और हाँ शीश महल को कैसे छोड़ दें। राजस्थान के आलीशान किलों में शीश महल ना हो ऐसा बहुत कम ही होता है।  शीश महल की छत के गुंबद में बारीकी से कटे शीशे देखते ही बनते हैं।  यहाँ देखिए शीशों द्वारा पैदा तिलिस्म जो काँच के इस बुर्ज में नज़र आता है....

और ये है वाणी विलास। 1875 में तब के महाराणा सज्जन सिंह ने यहां एक पुस्तकालय की स्थापना की। यहीं बैठकर कविराज श्यामल दास ने 'वीर विनोद' लिखी जो मेवाड़ के इतिहास को जानने के लिए एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। वैसे चित्र में एक बात गौर की आपने। उन्नसीवीं सदी के पंखे बिजली ना होने के कारण तेल से चला करते थे।


ऐसा नहीं कि परिसर में स्थित सारे महल ही चमक दमक से परिपूर्ण हों। सबसे शुरु में बने महल का हिस्सा जिसे राज आँगन कहा जाता है के कई कमरे सादगी के प्रतिमान नज़र आते हैं। रानियों और महिलाओं के कक्ष सामान्य कमरों जैसे दिखते हैं। मनोरंजन के लिए जगह जगह फर्श पर बनी चौपड़ दिखी।

वैसे सिटी पैलेस के सारे चौकों में  सबसे सुंदर चौराहा है मोर चौक।  यहाँ तीन शीशे के बने मोर हैं जो गर्मी जाड़े और वर्षा ॠतु को प्रतीकात्मक रूप से चित्रित करते हैं। इसके ठीक ऊपर बाहर की ओर निकलती हुई एक खूबसूरत सी बालकोनी है।
इन मोरों पर शीशों का ये बेहद खूबसूरत काम महाराजा सज्जन सिंह के समय हुआ। इम मोरों को बनाने में नीले, हरे, लाल और सुनहरे रंग काँचों के पाँच हजार टुकड़े लगे।


मोर चौक होते हुए आख़िर में हम पहुँचे जनाना महल के आहाते में। 


राजघराने द्वारा आयोजित भोज अब भी इसी जगह कराए जाते हैं। यहां पर उस समय की पालकी  रखी है। बगल में ही राणा की शानदार बघ्घी भी लगी हुई थी जिसकी सवारी वे आज भी खास मौकों पर किया करते हैं।


महल का कुछ हिस्सा आम जन के लिए खुला नहीं है। फतेहप्रकाश पैलेस और उसमें स्थित दरबार हाल को अब होटल में परिवर्तित कर दिया गया है।  पूरा पैलेस देखने में हमें दो घंटे लग गए थे। हमारे साथ तो स्थानीय लोग थे पर बेहतर यही है कि आप गेट पर टिकट लेते समय गाइड भी ले लें। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में दिखाएँगे कि कैसा लगता है उदयपुर शहर यहाँ के सबसे उँचे किले सज्जनगढ़ से। साथ ही होगी सिटी पैलेस से दिखते उदयपुर की झाँकियाँ। 
पर चलते चलते एक प्रश्न क्या आपके दिमाग में ये प्रश्न कभी उठा है कि मेवाड़ नरेश अपने आपको महाराजा ना कह कर महाराणा क्यूँ कहा करते थे ?

इस श्रृंखला में अब तक

20 comments:

  1. उदयपुर के बारे में
    ऐसे विस्तार से जान कर
    बहुत प्रसन्नता मिली
    सितम्बर माह में जाना तो हुआ था
    लेकिन ज्यादा समय
    'श्री नाथद्वारा' साहित्य सम्मलेन में ही व्यतीत हुआ .

    आभार स्वीकारें .

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  2. पूरा का पूरा संग्रहालय.

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  3. महल से लगा हुआ ही एक और दर्शनीय स्‍थल है और वह है क्रिस्‍टल गैलेरी। यह पर्यटकों के लिए खुली हुई नहीं है लेकिन विशेष व्‍यवस्‍था करने पर देखी जा सकती है। क्रिस्‍टल के बने अद्भुत वस्‍तुएं यहाँ प्रदर्शित हैं। आपके साथ हम भी अपने ही शहर को देखते चले जा रहे हैं। आपका आभार। अन्‍त में आपने एक प्रश्‍न किया है लेकिन उत्तर आप पर ही छोड़ देती हूँ। सभी की जिज्ञासा बनी रहनी चाहिए। महल के मुख्‍य द्वार पर मेवाड़ का राजचिन्‍ह भी अंकित है और उसमें एक तरफ राजपूत और दूसरी तरफ भील चित्रित है। अर्थात यहाँ क्षत्रीय और वनवासी भील दोनों ही सम्‍माननीय हैं। राजतिलक के अवसर पर इन्‍हीं भील समाज की उ‍पस्थिति अनिवार्य रहती है।

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  4. दानिश नाथद्वारा तो अपने एक प्राचीन मंदिर के लिए विख्यात है। मैं अपनी इस यात्रा में वहाँ नहीं जा सका था। बहरहाल सिटी पैलेस की यात्रा में साथ शरीक होने के लिए धन्यवाद !

    अजित गुप्ता जी आपने जो जानकारी बाँटी उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! मेरे जाने से कुछ दिनों पहले मेरी बहन भी वहाँ गई थी। उसने क्रिस्टल पैलेस की सुंदरता का जिक्र किया था और कुछ चित्र भी शेयर किए थे पर हम वहाँ नहीं जा पाए। मेवाड़ का राज चिन्ह हमने देखा था और इक तसवीर भी ली थी पर ये ध्यान नहीं रहा था कि उसमें पंखा झुलाती स्त्रियाँ भील और राजपूत की वेशभूषा में हैं। आपके अपने शहर के बारे में आप इसी तरह जानकारी साझा करती रहेंगी ऐसी आशा है।

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  5. राजस्थान की तो बात ही निराली है. धन्यवाद सिटी पैलेस से रूबरू करवाने का. यहाँ तो कई जगह की तसवीरें आपने ले लीं, जयपुर के सिटी पैलेस में तो कुछ स्थलों पर कैमरा allow नहीं था.

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  6. अभिषेक यहाँ कुछ कमरों के अंदर जाने की मनाही है पर कैमरे का टिकट ले के आप जितने चाहे चित्र खींच सकते हैं।

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  7. कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
    अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।

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  8. बहुत सुंदर जानकारी .. चित्र तो एक से बढकर एक हैं !!

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  10. राजस्थान में आपका स्वागत है. झीलों की नगरी उदयपुर तो राजस्थान की शान है, यहाँ के महल झीलें मंदिर सभी कुछ दर्शनीय है. उम्मीद है आप यहाँ के सभी दर्शनीय स्थलों की सैर करवाएंगे और हाँ आपने वहां का शिल्प ग्राम देखा या नहीं? और लगभग पचास मील दूर स्थित जयसमंद झील?

    नीरज

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  11. बहुत सुन्दर यात्रा वर्णन!
    अनुभवों को साझा करने से और लोगों में फैलेगा|
    धन्यवाद!

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  12. Thank you for a beautiful trip around Udaipur. I have never visited this city, but now feel that I have seen it.

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  13. मनीष जी,
    हमेशा की तरह... उम्दा.
    मनीष जी, क्या सचमुच कबूतर सही पते पर चिट्ठी पहुंचा सकता था? मुझे तो विश्वास नहीं होता.

    धन्यवाद्.

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  14. बहुत सुन्दर यात्रा वृतान्त ...सार्थक ...यादगार ..उदयपुर नहीं आ सका जयपुर सवाईमाधोपुर आस पास आदि तो घूम लिया था

    आभार आप का
    भ्रमर ५

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  15. चित्र और विवरण दोनों ही सुन्दर लगे. क्या महाराणा महाराजा का स्थानीय पर्याय नहीं है?

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  16. पसंदीदा स्थानों में से एक है ..क्रिस्टल पैलेस नहीं देख पाए
    विस्तृत विवरण के साथ एक बार फिर घूम आये !

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  17. शास्त्री जी, संगीता जी, दिलीप भाई, शालिनी, चंदन, सुधा जी, सुरेंद्र, वाणी जी पोस्ट पसंद करने के लिए आप सभी लोगों का शुक्रिया !

    नीरज जी उदयपुर और उसके आस पास के किलों को देखने में ही हमारे तीन दिन निकल गए। इसी वज़ह से जयसमंद और शिल्पग्राम नहीं जा सके।

    शर्मा जी महाराणा महाराज का स्थानीय पर्याय नहीं है।

    मुकेश कबूतरों द्वारा संदेश के आदान प्रदान का उल्लेख आपको इतिहास के पन्नों में मिल जाएगा। मुगलकालीन भारत में कबूतरों से संदेशों को पहुँचाने वाली बात मैंने कई जगह पढ़ी हैं।

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  18. Laazawab varnan. Aapki shaili itni khubsurat hai kahne ki , ki maano hum saath me ghoom rahen hon.

    Aabhaar.

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  19. तारीफ़ के लिए शुक्रिया राहुल ! आपको यात्रा विवरण रोचक लगा जानकर खुशी हुई। राजस्थान यात्रा की अगली कड़ी में शीघ्र ही आप सबको ले चलूंगा कुंभलगढ़ के किले में।

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